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Showing posts from May, 2013

सफर ये तय करना

जो भी था तकदीर में मेरी,
मैंने वो पा कर लिया अपनी हिम्मत सें,
औरों के जख्म ना भर सका,
तो अपने दर्द का साधन खुद कर लिया।

आज बैठा हूँ मैं फुरसत से,
कई मुद्दतो के बाद,
तो भी लगता हैं कि मैंने क्या कर लिया।

अपनी किस्मत की लकीरे,
बदल ली वक्त के साथ,
और रह गया तन्हा अपनी खुशियों का सिलसिला।

हैं कि इतनी मेहनत तो,
हर किसी की नेक हैं, चाहे कुछ गरीबी में,
कुछ अन्जान सम्पत्ति में।

यह भी हैं कि कर्म मेरा,
कर्म तेरा हैं अलग,
पर जो मैनें लाभ तेरी अपेक्षा का उठाया।

अभी बाकी हैं सफर ये तय करना।

न्याय के प्रकार

समय की पालकी में ये मन,
कितने सपने संजो कर रखता हैं,
पर कैसे विलश्रण हैं न्याय के प्रकार।

मन के पार, उपर की तह के पार,
सिर्फ कुछ रह जाते है विलक्षण उपहार,
मुशिकल है तय कर पाना किसका हैं अधिकार।

सीमा के पार, ठहरा नहीं जा सकता,
आँखे फेर चले या मान अपनी हार,
उल्लेखों से, क्या दें जाये हे राम की तार।

यहीं उचित हैं हर इच्छा के साथ,
कुछ होते है कर्तव्य अन्जान जैसे,
सौंप पाना सुख, समर्पण कर सके तो कर।